<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441</id><updated>2012-02-05T00:04:07.826-08:00</updated><title type='text'>होम्‍योपैथी और स्‍वास्‍थ्‍य</title><subtitle type='html'>एक होम्‍योपैथ फेल कर सकता है होम्‍योपैथी नहीं - महात्‍मा गांधी</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>16</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-2142985037605084237</id><published>2009-12-11T01:55:00.000-08:00</published><updated>2009-12-11T02:16:52.513-08:00</updated><title type='text'>आश्‍चर्यजनक रूप से तीसरे दिन लडकी का मेन्‍स चालू</title><content type='html'>&lt;strong&gt;हैदराबाद स्‍टार फीचर्स&lt;/strong&gt; में जब मैं हिन्‍दी का एडीटर था तब वहां साथ एक चित्रकार काम करते थे। जब उन्‍होंने जाना कि मैं कुछ होम्‍योपैथी जानता हूं तो एक दिन उन्‍होंने अपनी समस्‍याएं बतायीं। समस्‍या उनकी पत्‍नी और बेटी को लेकर थी। बेटी को लेकर उन्‍होंने बताया कि एक बार मेन्‍स के बाद &lt;strong&gt;उसका मेन्‍स रूक गया है&lt;/strong&gt; और काफी जांच पडताल के बाद अंग्रेजी में डाक्‍टर उसके लिए आपरेशन बता रहे हैं उसके पहले वे बहुत सी दवा खिला चुके हैं , क्‍या होम्‍योपैथी में कुछ है इसके लिए। भीतर से मैं घबरा गया कि क्‍या किया जाए पर  फिर मैंने पूछताछ की। &lt;br /&gt;मामला जटिल था पर जो एक बात मेरा ध्‍यान अटका रही थी वह यह थी कि एक बार मेन्‍स होकर फिर रास्‍ता बंद है जिसे आपरेट करने की बात है। तो मुझे लगा कि अगर एक बार रास्‍ता बन चुका है तो संभवत: दवाएं काम कर जाएं। तो मैंने पूछ ताछ की तो पता चला कि लडकी नमक ज्‍यादा खाती है और अन्‍य बातों को देखकर मैंने &lt;strong&gt;नेट्रम म्‍यूर 6&lt;/strong&gt; उसे खाने को कहा। बीस दिन खाने के बाद मित्र ने कहा दवा तो खा रह है वह लगातार पर अभी कोई फायदा नहीं दिखता। तब मैंने उसे पूरक दवा &lt;strong&gt;पल्‍साटिला 1 एम&lt;/strong&gt; की एक खुराक लेने को कहा।&lt;br /&gt;आश्‍चर्यजनक रूप से तीसरे दिन लडकी का मेन्‍स चालू हो गया। और मैंने खुद को आश्‍वसत किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-2142985037605084237?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/2142985037605084237/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=2142985037605084237' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2142985037605084237'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2142985037605084237'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2009/12/blog-post_11.html' title='आश्‍चर्यजनक रूप से तीसरे दिन लडकी का मेन्‍स चालू'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-5323492725310134415</id><published>2009-12-10T22:36:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T22:55:39.187-08:00</updated><title type='text'>कुछ लोग जिनके आरोग्‍य में मदद मिली होम्‍योपैथी से</title><content type='html'>&lt;strong&gt;राजूरंजन प्रसाद - पटना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजू मेरे अभिन्‍न मित्रों में हैं, हमारी दोस्‍ती के अब दो दशक होने को हैं वे मेरे पडोसी भी हैं। गहरी दोस्‍ती के बावजूद होम्‍योपैथी पर उनका विश्‍वास नहीं था। जबकि उनके ससुर होम्‍योपैथी में ही हर मर्ज की दवा ढूंढ लेते हैं। अब भी अगर मैं पटना जाता हूं तो सबसे पहले राजूजी से ही मिलता हूं और हर मुलाकात में उनके ससुर के पास किसी ना किसी मामले में होम्‍योदवा के बारे में पूछने को कुछ ना कुछ रहता है। &lt;br /&gt;राजूजी से दोस्‍ती के तब पांचेक साल हुए थे और वे &lt;strong&gt;सिरदर्द&lt;/strong&gt; से परेशान रहते थे सालों से और पेन कीलर की मात्रा बढती जा रही थी उनके खाते में स्थिति में अंतर नहीं पड रहा था तो अब कैट स्‍कैन की बारी थी तो मैंन टहलते हुए उनसे कहा कि जो इलाज करा रहे हैं वह कराइए पर एका बार होम्‍यो दवा भी ले कर देखिए। परेशानी बढी तो वे विचार करने को राजी हुए। मैंने उनके तमाम लक्षण लिखे। जिससे जाहिर हुआ कि यह सब कफ नही निकलने से हो रहा है और डाक्‍टर आपरेट कर कफ से जाम रास्‍ते को साफ करने की बात कर रहे हैं इसी के लिए कैट स्‍कैन होना है। &lt;br /&gt;उनकी खान पान आदि की बातें जानकर मैंने जब दवाएं छांटीं तो अंत में दो दवा बची - &lt;strong&gt;पल्‍साटिला&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;कैल्‍के कार्ब&lt;/strong&gt;, अब होम्‍यो सिद्धांत के अनुसार अब इसमें एक दवा चुननी थी।&lt;br /&gt;सारे लक्षण दोनों दवा के मिल रहे थे राजू से पर एक बात थी जो पूछनी बाकी थी , मैंने पूछा कि &lt;strong&gt;आपको खुली हवा पसंद है&lt;/strong&gt; या आप बंद कमरे में रहने में असुविधा महसूस नहीं करते। राजू ने बताया कि वे खुली हवा पसंद करते हैं। बस इस पर दवा का चुनाव कर लिया मैंने। &lt;strong&gt;पल्‍साटिला। 200&lt;/strong&gt; पावर में एक दो खुराक में ही उनको राहत मिली और वे आपरेशन से बच गए। उसके बाद से राजू जी और उनका परिवार होम्‍योपैथी की दवाएं आम तौर पर लेने लगे। &lt;br /&gt;उनकी पत्‍नी तब बहुत दुबली पतली थीं और उनकी परेशानी थी कि &lt;strong&gt;कमजोरी से उन्‍हें चक्‍कर आता है&lt;/strong&gt; , यह सुनकर मुझे पढा हआ याद आ गया कि अगर कोई मरीज आपके पास अपनी परेशानी लेकर आए और कहे कि उसे कमजोरी से चक्‍कर आ रहा है तो पहले &lt;strong&gt;चायना 6 &lt;/strong&gt;की एक फाइल खाकर आने को कहिए। चायना ने उन्‍हें बहुत फायदा किया। और उनके लिए तब से मैं बडा डाक्‍टर बन गया। &lt;br /&gt;इसी तरह उनके बेटे को जो अब कद्दावर हो गया है तब &lt;strong&gt;स्‍कूल जाने के समय पेट दर्द&lt;/strong&gt; हो जाया करता था। उसे मैंने &lt;strong&gt;कैल्‍के फॉस&lt;/strong&gt; दी और उससे उसकी यह परेशानी जाती रही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-5323492725310134415?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/5323492725310134415/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=5323492725310134415' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/5323492725310134415'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/5323492725310134415'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='कुछ लोग जिनके आरोग्‍य में मदद मिली होम्‍योपैथी से'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-747248531248970724</id><published>2008-08-23T00:42:00.001-07:00</published><updated>2008-08-23T01:28:38.481-07:00</updated><title type='text'>बच्चों का कैंसर : एएलएल - कुमार मुकुल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SK_KKpcDmkI/AAAAAAAAAp0/NNViShtj4og/s1600-h/200620082363.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SK_KKpcDmkI/AAAAAAAAAp0/NNViShtj4og/s320/200620082363.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5237627175926209090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कैंसर यानि कर्कट रोग को सामान्यत: असाध्‍य और कुछ हद तक दु:साध्‍य बीमारी के रूप में जाना जाता है। इसमें भी ब्लड कैंसर, जिसे हिंदी में रक्त कर्कट कहा जा सकता है, का नाम सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है। यह अभी भी कम लोगों को पता है कि बच्चे भी कैंसर का शिकार होते हैं। क्योंकि आम राय में यह बीमारी बुरी आदतों का नतीजा होती है और स्वभावत: आदतें बड़ी उम्र में ही दुष्प्रभाव डालना शुरू करती हैं। पर कटु सच यही है कि आज बड़ी संख्या में बच्चे ब्लड कैंसर का शिकार हो रहे हैं।&lt;br /&gt;कैंसर अस्पतालों में अगर आप असमय गंजे हो चुके बच्चों को देखेंगे तो सामान्यत: यह कल्पना भी नहीं कर पाएंगे कि अल्पवय में खल्वाट हो चुके सिरों पर बिना कोई शिकन लाए धमा-चौकड़ी में मग्न ये बच्चे उसी समय ब्लड कैंसर के आक्टोपसी पंजों से जूझ रहे होते हैं। और यह मजेदार तथ्य है कि कैंसर की मरणांतक पीड़ा को खेल-खेल में भुगत रहे इन बच्चों में से अिधकांश इस रक्त कर्कट को पराजित कर देते हैं। हां, यह एक विडंबनापूर्ण सच्चाई है कि एएलएल (एक्यूट लिम्फोब्लािस्टक यूकेमिया) से ग्रस्त बच्चों में से सत्तर-अस्सी फीसदी बच्चे इलाज के बाद रोगमुक्त हो जाते हैं। जबकि इसी बीमारी से ग्रस्त अधिक उम्र के लोगों में मात्र तीस प्रतिशत के ही कठिनाई से रोग मुक्त होने की उम्मीद रहती है। &lt;br /&gt;रक्त की सफेद कोशिकाओं का कैंसर दो तरह को होता है। पहला एएलएल जिसमें कोशिका के लिम्फोसाइटस प्रभावित होते हैं और दूसरा ।डस् जिसमें कोशिका के मेवायड्स रोगग्रस्त होते हैं। बच्चों को अधिकांशत: एएमएल होता है और कीमोथेरेपी और रेडियेशन से इसे काफी हद तक ठीक कर लिया जा सकता है। एएलएल बड़ों को भी होता है पर दवाओं की टािक्सटी (जहरीलापन) झेलने की क्षमता बड़ों में बच्चों से काफी कम होने के कारण उनमें कई तरह की जटिल जेनेटिक असामान्यताएं पैदा होती हैं। फलत: बड़ों में एएलएल से पूर्णत: रोगमुक्त होने का अनुपात काफी कम होता है। ।डस् बड़ों के अनुपात में बच्चों को ज्यादा होता है। एक साल से कम उम्र के बच्चों को एएलएल ज्यादा होता है और वह एएमएल से ज्यादा खतरनाक होता है।&lt;br /&gt;एएलएल के भी तीन प्रकार होते हैं। एल-1,एल-2,एल-3 कई शोधकर्ता एल-3 को एएलएल नहीं मानते हैं। इसे वे बरकिट्स लिंफोमा/ल्यूकेमिया पुकारते हैं। एल-3 बाकी दोनों एएलएल के मुकाबले अलग आचरण करता है।&lt;br /&gt;एल-1 और एल-2 का उपचार एल-3 के मुकाबले थोड़ा भिन्न होता है। &lt;br /&gt;एएलएल के इन प्रकारों में अंतर का आाधार उनकी कोशिकाओं का आकार-प्रकार होता है। एल-1 की कोशिकाओं का आकार जहां छोटा और समानुरूप होता है वहीं एल-2 की कोशिकाओं में कुछ कोशिकाएं जहां बड़ी होती हैं वहीं कुछ छोटी होती हैं।&lt;br /&gt;एएलएल का असर अलग-अलग बच्चों में अलग-अलग होता है। कुछ बच्चे जहां तेजी से रोगमुक्ति की ओर बढ़ते हैं, वहीं कुछ की रोगमुक्ति में समय लगता है। एएलएल का असर कितना गहरा है इसे कुछ टेस्ट्स से जाना जाता है। बच्चे की उम्र और टीएलसी,टोटल ल्‍यूकोसाइट काउंट, के आधार पर यह तय किया जाता है कि मरीज की स्थिति क्‍या है। काउंटस एक लाख से अधिक हो तो बीमारी गंभीर मानी जाती है।&lt;br /&gt;मोटा-मोटी काउंट के आधार पर मरीजों की तीन श्रेणियां बनाई जाती है। बहुत अच्छा, सामान्य और खतरनाक। यूके में पहली श्रेणी के सामान्य तोर पर दवा देते हैं और तीसरी ख़तरनाक श्रेणी पर शुरू से कड़ी निगाह रखनी पड़ती है।&lt;br /&gt;रोग की सही स्थिति के ज्ञान के लिए रोगियों को अपने सारे टेस्ट ध्‍ौर्यपूर्वक कराने चाहिए। देखा जाता है कि कैंसर की शंका होते ही रोगी और मरीज घबरा जाते हैं और आशा करते हैं कि डाक्टर तुरत-फुरत उनका इलाज आरंभ कर दें। जबकि डाक्टर को सही ढंग से इलाज करने के लिए सारे टेस्ट रिपोर्ट्स देखना जरूरी होता है।&lt;br /&gt;जीन टेक्नालोजी के विकास के साथ एएलएल की चिकित्सा में भी कई सहूलियतें बढ़ी हैं। आज उसका जेनेटिक पहलू जानना इलाज में कई तरह से मददगार होता जा रहा है।&lt;br /&gt;एएलएल की चिकित्सा में उसका फीनो टाइप लिम्‍फोब्‍लास्‍ट, मार्बर्स, जानने से सुविधा होती है। इसके लिए रोगी के लिम्फोब्लास्ट, मार्बर्स, डीएनए इंडेक्स और जैनेटिक टेस्ट का सहारा लिया जाता है। लिम्फोब्लास्ट से यह पता चलता है कि रोगी में टीसेल्‍स इम्‍यूनोफीनोटाइप है या बी सेल्स। इस आधार पर दवाओं का अलग-अलग कोर्स होता है।&lt;br /&gt;फिलाडेिल्फया क्रोमोजोम-यह एक तरह की जेनेटिक एबनार्मलिटी है।&lt;br /&gt;एक कोशिका में जीन के 23गुणा दो बराबर 46 जोड़े होते हैं। इनके स्वरूप में जब कई तरह की गडबिड़यां होती हैं तो कैंसर जैसी बीमारी होती है।&lt;br /&gt;एक तरह की गड़बड़ी को मोनोसोमी कहा जाता है। इसमें क्रोमोजान के जोड़े में से एक खो जाता है।&lt;br /&gt;दूसरे तरह की गडत्रबड़ी को हायपरडिप्ल्वायडी पुकारा जाता है। इसमें 46 से अधिक क्रोमोजोम होते हैं। जैसे 50 या अधिक । जीन की गड़बड़ी यह होती है कि उसकी एक बांह टूटकर दूसरे से जुड़ जाती है। इसे ट्रांसलोकेशन पुकारा जाता है। जीन की इसी गड़बड़ी को फिलाडेिल्फया क्रोमोजीन कहा जाता है। क्योंकि इसका पता पहली बार अमेरिका के फिलाडेिल्फया नामक जगह पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने लगाया यही क्रोमोजोम की यह गड़बड़ी सामान्यत: क्रोनिक मेल्वायड ल्यूकेमिया सीएमएल में पायी जाती हैं पर एएलएल के कुछ मरीज भी इसके शिकार होते हैं। ऐसे मरीजों को विशेष ध्‍यान और सतर्कता की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;फिलाडेिल्फया की गड़बड़ी में 23 क्रोमोजीमों के जोड़ों में से 9वें क्रोमोजोम में 22 वें क्रीमोजोम का एक हिस्सा टूटकर आ मिलता है। (9:22)&lt;br /&gt;शरीर की कोशिकाओं में दोतरह के जीन हमेशा वर्तमान रहते हैं? एक को कैंसर रोधी जीन कहा जाता है तो दूसरे को आन्कोजीन (कैंसरस) पुकारा जाता है। इनके अनुपात में गड़बड़ी आने पर ही कैंसर होता है। यह गड़बड़ी कैसे आती है।&lt;br /&gt;मां के गर्भ में एक्‍सरे के असर से या का अनाज में पेस्टीसाईड का असर भी एएलएल का कारक हो सकता है।&lt;br /&gt;मां के खाने का भी असर होता है। पर कुछ ज्यादा फल खाने वाली महिलाओं के बच्चों को भी एएलएल देखा गया है।&lt;br /&gt;एएलएल के वैसे मरीज जो फिलाडेिल्फया क्रोमोजीन के शिकार होते हैं उन्हें रोगमुक्ति के लिए बोनमैरो ट्ररांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। ट्रांसप्लांट में कभी-कभार जान जाने का भी खतरा पैदा हो सकता है? आजकल ट्रसंप्लांट के विकल्प के रूप में एक दवा ईजाद हुई है इसे ग्लीभेक कीमो कहा जाता है? यह कैसे काम करता है। यह दवा (टेबलेट) कीमो के साथ देनी होती है। इसे जीवन भर खाना पड़ता है। ग्लीभेक कीमो के कुछ केसेज में यह काम नहीं भी कर सकता है। ट्रांसप्लांट और ग्लीभेक का खर्च करीब-करीब बराबर आता है।&lt;br /&gt;एएलएल के फिलाडेिल्फया वाले मरीजों में एक तरह के प्रोटीन की वृिद्ध को रोग के उत्प्रेरककार के रूप में देखा जाता है। ग्लीभेक दवा उस प्रोटीन के अनुपात को कम करती है?&lt;br /&gt;ब्लड कैंसर की एक विशेषता यह है कि इसमें सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती? अन्य कैंसरों से यह इसी मामले में अलग होता है। अन्य कैंसरों की तरह इसमें फस्र्ट, सेकेंड, थर्ड स्टेजेज नहीं होते। चूंकि इसमें गड़बड़ी खून में ही होता है। इसका मुख्य इलाज केमोथेरापी (केमिस्ट्री थेरापी) ही है। मतलब दवा और सिंकाई से। एएलएल के मरीजों को जब कीमो पड़ती है तो इसके असर से कोशिकाएं तेजी से मरती हैं। दवा से कैंसर कोशिकाएं अधिक मरती है। इसके चलते शुरू में थोड़ी कठिनाई होती है और दवा चलने के बाद ब्लड काउंट घर जाने पर रोगियों को भर्ती कर उन पर निगाह रखी जाती है। क्योंकि ऐसे रोगियों में प्रतिरोधी सफेद कोशिकाओं के तेजी से क्षरण के कारण उन्हें इंफेक्शन का खतरा रहता है। इलाज के दौरान जिन 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत मरीजों की जान जाती है वह रोग के कारण नहीं, दवा के बाद हुए इंफेक्शन से होती है। इसीलिए शुरू में रोग के इलाज के दौरान विशेष सफाई की जरूरत रहती है।&lt;br /&gt;कुछ समय तक कीमी चलने के बाद सामान्य कोशिकाएं फिर से बढ़ने लगती हैं और कैंसर कोशिकाएं नष्ट होती जाती है? जल्दी ही कैंसर कोशिकाएं नियंत्रित हो जाती हैं।&lt;br /&gt;पर बीमारी पुन: वापिस ना हो इसके लिए दवाओं का चार-पांच महीने का कोर्स चलाया जाता है। हर महीने बोन मैरो टेस्ट कर कैंसर कोशिकाओं की स्थिति को जाना जाता है।&lt;br /&gt;बच्चों का अन्य तरह का कैंसर छह माह के इलाज से ठीक हो जाता हैं पर ।स्स् का इलाज लंबा चलता है। करीब दो-तीन साल तक।&lt;br /&gt;ब्लड कैंसर में चूंकि बीमारी खून को ही प्रभावित करती है इसलिए यह अन्य कैंसरों से जटिल होता है। केमोथेरापी से सफलतापूर्वक रोग के विकास को नियंत्रित कर लिया जाता है। पर इसकी जटिलता का मुख्य कारण यह है कि अभी तरह ऐसा कोई तरीका इजाद नहीं किया जा सका है जिसके तहत यह पता किया जा सका है जिसके तहत यह पता किया जा सके कि अब मरीज के खून में एक भी कैंसर कोशिका नहीं है।&lt;br /&gt;देखा गया है कि कीमो से शरीर की अधिकांश कैंसर कोशिकाएं मर जाती हैं पर शरीर की बनावट के चलते आदमी के ब्रेन में दवाओं का असर नहीं होता? मस्तिष्क को दवाओं के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए शरीर के भीतर अपनी एक व्यवस्था है। इसे ब्लड ब्रेन बैरियर कहा जाता है। जब हम कोई दवा खाते हैं तो यह बैरियर दवाओं को बाकी शरीर की तरह सीधे ब्रेन (मस्तिष्क) में जाने से रोकता है।&lt;br /&gt;इसी कारण जब कीमोथेरापी से एएलएल का आरंभ में इलाज शुरू हुआ तो जांच में कैंसर कोशिका नील दिखने पर भी बीमारी रक्त का नमूना लेकर जब जांचा गया तो कारण पता चला कि बैरियर के कारण ब्रेन तक दवा ठीक से नहीं पहुंचती थी और कैंसर कोशिकाएं वहां छुपी रह जाती थीं। तब इसका हल निकाला गया-रेडियोथेरापी इसमें ब्रेन के उस हिस्से की बिजली से सिंकाई की जाती है जहां कैंसर कोशिकाओं के छिपे होने की आशंका होती है।&lt;br /&gt;इस तरह चार-पांच माह के भीतर कीमो और सिंकाई से सामान्यत: बीमारी को निर्मल कर दिया जाता है। कुछ लड़कों में देखा गया है कि उनकी बीमारी टैस्टीजर में छुपी रह जाती है। दरअसल ब्रेन की तरह का एक साधारण सा बैरियर टेस्टीज में भी करता है। टेस्टीज में बीमारी निकलने पर उसकी भी सिंकाई कराई जाती है।&lt;br /&gt;सुरक्षात्मक दृष्टि से आगे डेढ़-दो साल तक कुछ दवाएं चलती रहती है। तीन-तीन महीने के दवाओं के कोर्स के बाद हर बार बोन मैरो टेस्ट कर कैंसर कोशिका की वापसी तो नहीं हुई यह जांचा जाता है। स्थिति लगातार नार्मल होने पर रोगी को रोगमुक्त करार दिया जाता है।&lt;br /&gt;देर तक एएलएल होने का पता नहीं चलने पर मरीज के शरीर में टयूमर और गििल्टयां निकल सकती हैं। त्वचा पर भी गांठ उमर सकती है। इस बीमारी का गुर्दे और हड्डी पर बुरा असर पड़ सकता है। बीमारी बढ़ने पर हडि्डयों पर दाग-धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं। ग्रे से इसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;ब्लड कैंसर से कभी-कभी इलाज में देर होने पर आंख भी प्रभावित होती है और वहां टयूमर बनने लगता है। और देर करने पर आंख ट्यूमर के साथ बाहर आने लगती है। समय पर इलाज शुरू नहीं करने पर आंख जा भी सकती है। आंखों में ट्यूमर का मामला अधिकतर ।डस् में देखा जाता है, ।स्स् में ज्यादातर गांठे होती हैं जो गले के नीचे और अन्य जोड़ों पर होती हैं। एएलएल से तिल्ली बढ़ जाती है और लीवर भी प्रभावित होता है। इस सबका बराबर ध्‍यान रखना पड़ता है। &lt;br /&gt;खून में कैंसर कोशिकाओं की उपस्थिति की जांच का एकमात्रा तरीका बोनमैरो टेस्ट है। इससे भी कोशिकाओं की स्थिति की शत-प्रतिशत जांच संभव नहीं हो पाती? ऐसे में कुछ ( ») मरीजों में अगर कहीं कैंसर कोशिकाएं छुपी-बची रह जाती हैं तो वे फिर से बीमारी को जगा देती हैं। ऐसे में दो-ढाई साल के बाद जब दवा बंद कर दी जाती है तब बीमारी फिर से उभर जाती है।&lt;br /&gt;इसका पता तब चलता है जब मरीज बच्चे को बुखार आना या अन्य लक्षण आरंभ होता है। तब जांच करने पर अगर फिर से बीमारी के वापस होने का पता चलता है तो फिर से कीमोथेरापी आरंभ करनी पड़ती है। फिर इसी तरह पहले ज्यादा स्ट्रांग कीमो का प्रयोग करना पड़ता है।&lt;br /&gt;कभी-कभी एक मरीज को दो-तीन बार बीमारी वापस आते पाया गया है। हर बार मरीज पहले से ज्यादा कमजोर होता जाता है और दवा की रेसीस्टेंसी भी घटती जाती है ऐसे मरीजों में। फिर खतरा बढ़ता जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-747248531248970724?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/747248531248970724/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=747248531248970724' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/747248531248970724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/747248531248970724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/08/blog-post_23.html' title='बच्चों का कैंसर : एएलएल - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SK_KKpcDmkI/AAAAAAAAAp0/NNViShtj4og/s72-c/200620082363.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-2682343099033923184</id><published>2008-08-14T20:10:00.000-07:00</published><updated>2008-08-14T20:13:47.300-07:00</updated><title type='text'>खुजली पहले मन में होती है फिर त्वचा पर</title><content type='html'>खुजली को सामान्यत: एक भद्दी पर आसान बीमारी माना जाता है। पर एक तरह से यह रोगों की दुनिया में पहला कदम होता है। पहले आदमी को मानसिक खुजली होती है, यानी बेचैनी होती है। फिर वह शारीरिक खुजली का रूप ले लेती है।&lt;br /&gt;खुजली दरअसल आपके विकारों को त्वचा के माध्‍यम से बाहर करने का शरीर का प्रारिम्भक तरीका है-जब मल-मूत्र पसीने के रास्ते शरीर अपनी गन्दगी को बाहर करने में असमर्थ होता जाता है, तब वह उसको त्वचा पर स्फोट के रूप में बाहर करता है।&lt;br /&gt;सामान्यत: लोग खुजली होने पर दूरदर्शनी विज्ञापनों में प्रचारित दवाओं का सहारा ले उसे दबा देना चाहते हैं। कई बार आसानी से डेरोबिन, बी-टेक्स जैसे मलहम उसे ऊपर से ठीक भी कर देते हैं। ऐसे में या तो वह फिर त्वचा पर दूसरी जगह उभरता है या फिर त्वचा की ओर हो रहे दूषित द्रव को ये दवाएं भीतर से अन्य अंगों की ओर मोड़ देती हैं।&lt;br /&gt;अब यह द्रव जिस अंग को अपना केन्द्र बनाता है, उस अंग को ये क्षति पहुंचाते हैं और उसे किसी रोग का नाम दे दिया जाता है। फेफड़े की ओर का रुख हो जाता है, तो टीवी होती है। जोड़ों की ओर हुआ, तो उसे गठिया पुकारा जाता है। हृदय की ओर हुआ, तो उसे हृदय रोग कहा जाता है। इसी तरह जिस अंग को यह द्रव दूषित करता है, उसे एक रोग का नाम मिल जाता है। आंखों की ओर होता है, तो गुहौरी या आंखों से कीच अपने, लाली रहने की बीमारी हो जाती है। ये सभी जीर्ण काटि के रोग होते हैं।&lt;br /&gt;यहां भी स्थिति संभाली जा सकती है और उचित दवा के प्रयोग से उसे रोका जा सकता है। पर इस स्थिति के बाद आप हमेशा स्वस्थ रहने के लिए किसी दवा के मोहताज हो जाते हैं।&lt;br /&gt;पर इस स्थिति में भी सही इलाज न हो, तो कैंसर जैसी असाध्‍य बीमारी की चपेट में आप आने लगते हैं।&lt;br /&gt;कैंसर कभी भी अचानक नहीं हो जाता। जैसा कि कहा जाता है कि कोई आदमी पान-बीड़ी कुछ भी नहीं लेता या साधु था, उसे कैंसर हो गया। पर आप पता करेंगे कि उसे पहले कई छोटी बीमारियां रही होंगी, जिन्हें वह अज्ञानवश दबाता चला गया होगा।&lt;br /&gt;कई बार खुजली का कारण पेट में या शरीर में पैदा हो गए कृमि (कीड़े) भी होते हैं। ऐसे में खुजली की जगह पर लवेंडर आयल का एकाध सप्ताह प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद उचित दवा लेनी पड़ती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-2682343099033923184?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/2682343099033923184/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=2682343099033923184' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2682343099033923184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2682343099033923184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='खुजली पहले मन में होती है फिर त्वचा पर'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-6712574070295413935</id><published>2008-05-26T21:58:00.000-07:00</published><updated>2009-09-08T12:04:05.067-07:00</updated><title type='text'>दांत किटकिटाने का मतलब पेट में कीड़ा होना ही नहीं - कुमार मुकुल</title><content type='html'>हर बार दांत किटकिटाने का मानी पेट में कीड़ा होना नहीं होता। कीड़ों के लिए अनुकूल वातावरण होने पर एक बार उन्हें दवा से मार देने के बाद भी वे बार-बार पनप जो हैं। मीठा और मांस-मछली अधिक खाने से भी पेट में कीड़े पनप जाते हैं। इन आदतों पर नियंत्रण करना होगा।&lt;br /&gt;कीड़े कई तरह के होते हैं, उनके लिए अलग-अलग दवाए¡ लेनी पड़ती हैं। पेट में अगर राउंड वर्म यानी गोलकृमि हों, तो आप होम्योपैथिक दवा सिना का प्रयोग कर सकते हैं। सिना रोगी मोटा और गुलाबी चेहरेवाला होता है। वह चिड़चिड़ा, भुक्खड़ और मीठा पसन्द करनेवाला होता है। अपनी नाक वह खोदता रहता है। ऐसे रोगी सिना 30 की तीन खुराकें रोज ले सकते हैं।&lt;br /&gt;टेप वर्म यानी फीता कृमि के लिए आप क्यूप्रम आक्सीडेटेम निग्रम 1 एक्स की कुछ खुराकें ले सकते हैं। फीता कृमि के लिए आप रोगी को कद्दू के बीजों को छलकर भीतर का हिस्सा खिलाए¡, तो इससे भी कृमि बेहोश हो गुदा मार्ग से बाहर आ सकते हैं। जब कीड़े बाहर आ रहे हों, तब आप उन्हें निकलने दें। बीच से खींच कर उसे तोड़ें नहीं, नहीं तो बाकी बचा हिस्सा जो भीतर रह जाएगा, वह फिर से नया कृमि बन जाएगा।&lt;br /&gt;अगर रोगी को सूत्रा कृमि यानी थे्रड वर्म हो, तो उसे आप चेलोन क्यू की चार-पा¡च बू¡दें एकाèा खुराके देकर कृमि से छुटकारा दलिा सकते हैं। कृमि अगर गुदा प्रवेश में खुजली पैदा करते हों, तो वहा¡ वैजलीन या ओलिव आयल का प्रयोग करने से राहत मिलती है।&lt;br /&gt;यह तो कीड़ों की दवा हुई, पर दा¡त किटकिटाने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। ऐसे में नीचे की दवाओं को उनके लक्ष्ज्ञणों का मिलान कर रोगी को &lt;br /&gt;ठीक किया जा सकता है। बेलाडोना 30 का रोगी भी दा¡त किटकिटाता है। ऐसे में अगर रोगी को प्यास नहीं लगती हो और उसे दूèा-मांस नापसन्द हो, भूख कम हो, तो बेला से उसे आराम पहु¡चाया जा सकता है। एंटिम क्रूड के रोगी की जीभ पर सफेदी जमी रहती है और वह आग के पास बैठना पसन्द नहीं करता। इस लक्षण पर आप क्रूड की छह पावन की रोजाना तीन खुराकें देकर उसे दा¡त किटकिटाने से बचा सकते हैं।&lt;br /&gt;आर्स एल्बम का रोगी भी दा¡त बजाता है। पर उसे बेला के विपरीत प्यास अिèाक लगती है। उसे मोटा तकिया लेना पसन्द होता है। वह दूèा भी पसन्द करता है। ऐसे रोगी को आप आर्स 30 की रोज तीन खुराकें देकर उसे स्वस्थ कर सकते हैं। कैनेबिस इंडिका का रोगी अगर दा¡त बजाए, तो देखना होगा कि क्या वह भुलक्कड़ है। कैनेबिस रोगी भी वाचाल होता है और उसे डरावने सपने आते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-6712574070295413935?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/6712574070295413935/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=6712574070295413935' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6712574070295413935'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6712574070295413935'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/05/blog-post_26.html' title='दांत किटकिटाने का मतलब पेट में कीड़ा होना ही नहीं - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-8528109557172685289</id><published>2008-05-08T20:17:00.001-07:00</published><updated>2009-09-08T12:04:26.308-07:00</updated><title type='text'>हाय, आप चाय लेंगे - कुमार मुकुल</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चाय&lt;/strong&gt; का आफर मिलने पर अगर कोई चाय पीनेवाला आदमी इनकार करे, तो देखना होगा कि वह वाकई चाय से होनेवाली खामियों के प्रति सचेत हुआ है याफिर उसका फिजिक ही चाय पचा पाने लायक नहीं रह गया है। ऐसे में आप उसे फासफोरस 30 का प्रयोग करने की राय दे सकते हैं।&lt;br /&gt;फासफोरस के रोगी को चाय पचती ही नहीं है। उसका मेटाबोलिज्म (चायपचय) ऐसा बिगड़ा होता है कि वह सामान्य चीजों को भी पचा पाने लायक नहीं रह जाता है। फासफोरस रोगी दुबला-पतला होता है। खास कर उसकी छातियां सिकुड़ी होती हैं। उसके जोड़ कमजोर होते हैं। उसकी चमड़ी पतली और साफ होती है। पर जो लोग वाकई चाय बहुत पीते हों और उनकी आंतें जवाब दे रही हों और परिणामस्वरूप कब्ज भयंकर होती जा रही हो, तो आप हाइड्रेिस्टस को याद कर सकते हैं। आंतें जब मल-निष्कासन में असफल होती जाती हैं, ऐसे में हाइड्रेिस्टस क्यू रामबाण सिद्ध होता है। ऐसा रोगी खुद को कुशाग्रबुिद्ध समझता है। उसे साइनस भी रहती है। पुराने कब्ज की भी हाइड्रेिस्टस अच्छी दवा है और लम्बे समय तक चाय पीना कब्ज को बढ़ावा देता है। ऐसे में इसकी भूमिका स्वयंसिद्ध होती है। ऐसे में सामान्य दवाएं, जो पेट साफ करने में असफल सिद्ध हों तो आप होम्योपैथी की यह दवा दस बूंद सुबह-शाम ले सकते हैं। चाय पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है। ऐसे में हाइड्रेिस्टस कैंसर से आपका बचाव करता है।&lt;br /&gt;चाय पीने से अगर पेट में ऐंठन होती हो और कोई भी खाद्य पदार्थ अनुकूल पड़ता हो, तो आप चाय को छोड़ फेरमफास 12 एक्स का प्रयोग कर सकते हैं। चाय की गड़बिड़यों को एक हद तक चायना भी एक हद तक संभालती है। चाय से जो स्नायविक गड़बिड़यां होती हैं, कमजोरी और पेट में गैस भी, ऐसे में चायना काफी काम की सिद्ध होती है। चाय पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है। इस सबको आप चायना 30 की कुछ खुराकें लेकर ठीक कर सकते हैं।&lt;br /&gt;यू¡ चाय से पैदा होनेवाली न्यूरोलाजिकल गड़बिड़यों को थूजा भी दूर कर देता है। अिèाक चाय पीने से अगर आपका खून गन्दा हो गया हो और चेहरे पर लाल फुंसियां निकल रही हों, तो इस गन्दगी को उभारने के लिए आप आरम्भ में हीपर सल्फ की भी कुछ खुराकें ले लें, तो बेहतर होगा।&lt;br /&gt;यूं जिनको चाय से अभी कोई हानि न दिखती हो, पर उससे होनेवाले खतरों के प्रति वे सचेत हों और चाय छोड़ना चाहते हों, तो अपने लक्ष्णों का मिलान कर वे हीपर सल्फ, हाइड्रेिस्टस या कैल्के सल्फ की कुछ खुराकें ले सकते हैं।&lt;br /&gt;चाय अक्सर अल्युमीनियम के भगोने में खदका कर बनाई जाती है। चाय के अलावा यह अल्युमीनियम भी घुल कर पेट की प्रणाली को बार्बाद करने में कम भूमिका नहीं निभाता है। चाय के विकल्प के रूप में कुछ दिन आप नींबू की चाय पी कर काम चला सकते हैं। दिल्ली में आइआइटी के छात्रों को उसी रंग का जो पेय उपलब्‍ध कराया जाता है, उसमें सौंफ आदि पचासों जड़ी-बूटियां मिली होती हैं। अखंड ज्योति द्वारा प्रचारित प्रज्ञा पेय भी चाय का विकल्प हो सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-8528109557172685289?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/8528109557172685289/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=8528109557172685289' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8528109557172685289'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8528109557172685289'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html' title='हाय, आप चाय लेंगे - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-8941560723646366215</id><published>2008-05-02T08:57:00.001-07:00</published><updated>2009-09-08T12:05:03.298-07:00</updated><title type='text'>पगला कहीं का - कुमार मुकुल</title><content type='html'>जब कोई प्यार से आपके गाल थपथपाता हुआ कहता है, पगला कहीं का, तो आप उसे स्नेह की अभिव्यक्ति मानते हैं। पर आपकी किसी क्रिया पर आपका संगी अचानक चिल्ला कर कहे कि पगला गए हो क्या, तो आपको विचार करना चाहिए कि कहीं आपका नर्वस सिस्टम उत्तेजित तो नहीं हो रहा।&lt;br /&gt;मस्तिष्क और उसके स्नायु मंडल में जब किसी कारण उत्तेजना पैदा होती है, तब आदमी अपने होश खाने लगता है। पहले तो वह प्रलाप की अवस्था में जाता है, फिर कभी ह¡सना, अकारण रोना, दा¡त काटते दौड़ना आदि क्रिया करने लगता है। ऐसे में उसे लक्षणों के हिसाब से अगर होमियोपैथी दवा दी जाए, तो उसे का¡के और आगरा जाने से बचाया जा सकता है। पागलपन की ऐसी अवस्था में बेलाडोना हायोसायमस और स्ट्रैमोनियम को लक्षणों के हिसाब से दिया जाना चाहिए। डॉण् नैश इन तीनों दवाओं को पागलपन की मुख्य प्राथमिक दवा मानते हैं। किसी भी बीमारी में अप्रत्याशित तेजी के लिए बेलाडोना को याद किया जाता है। अगर रोगी हर काम बहुत तेजी से करे, अचानक अपना गला दबाने की कोशिश करे, या सामनेवाले को अपनी हत्या करने को कहे, खाना खाने की जगह प्लेट-चम्मच चबाने की कोशिश करे, तो ऐसे में बेलाडोना 30 की कुछ खुराकें उसे नियंत्रित कर सकती हैं। रोगी की आ¡खें लाल हों और वह एक जगह नजर गड़ा कर देखता हो, अपने कपड़े फाड़ डालता हो और किसी के द्वारा माने जाने के काल्पनिक भय से इधर-उधर भागता हो, तो ऐसे में बेलाडोना ही काम करता है।&lt;br /&gt;पागलपन का रोगी अगर उतना हिंसक न हो, बल्कि उनके मनोविकार ज्यादा प्रकट हो रहे हों, जैसे अकारण ह¡सना, गाना, बेहूदी बातें करना, उड़ने का अनुभव करना आदि, तो ऐसे में हायोसायमस 30 की कुछ खुराकें उसे नियंत्रिात कर सकती हैं। हायोसायमस के मूलार्क के कुछ चम्मच पी लेने से स्वस्थ आदमी में भी ये लक्षण उभर सकते हैं।&lt;br /&gt;पर विकट पागलपन की दवा है स्ट्रोमोनियम। इसमें रोगी की बकवास की प्रवृत्ति ऊपर की दोनों दवा से ज्यादा होती है। स्ट्रेमो रोगी अ¡धेरे से डरता है जबकि बेला का रोगी अ¡धेरा पसन्द करता है। स्ट्रेमो रोगी बेला के विपरीत अकेला रहना नहीं चाहता है।&lt;br /&gt;अगर रोगी आत्महत्या के इरादे से भाग जाने की फिराक में रहता हो और इसमें बाधक बननेवाले की हत्याकरने की बात करता हो, तो ऐसे में मेलिलोटस 6 की कुछ खुराकें उसे शान्त करती है। मेलि रोगी को लगता है कि उसके पेट में कुछ गड़बड़ है। उसमें भूत बैठा है। पर रोगी पागल हो जाने की आशंका खुद व्यक्त करता हो या उसका समय जल्दी नहीं बीतता प्रतीत होता हो या अपना रास्ता उसे अनावश्यक लम्बा लगता हो, तो ऐसे में भुलक्कड़ रोगी को कैनेबिस इंडिका का मूलार्क या 6 पावर की दवा लेनी चाहिए। अगर किसी को लगे कि वह बहुत धनी हो और अपने नए कपड़े भी वह जोश में फाड़ डाले या पुराने कपड़े में खुद को राजा महसूस करे, तो उसे सल्फर-1 एम की एक खुराक देकर देखें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-8941560723646366215?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/8941560723646366215/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=8941560723646366215' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8941560723646366215'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8941560723646366215'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='पगला कहीं का - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-8735167950546135041</id><published>2008-04-18T19:09:00.000-07:00</published><updated>2009-09-08T12:05:48.716-07:00</updated><title type='text'>आ अब लौट चलें - कुमार मुकुल</title><content type='html'>&lt;strong&gt;जब घर की याद सताए&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होमियोपैथी में किसी रोग विशेष का इलाज नहीं कियाजाता बल्कि इसमें रोगी के लक्षणों के आधार पर दवा का चुनाव किया जाता है। फिर वैसे ही लक्षण पैदा करनेवाली दवा की खुराकें देकर उस लक्ष‍ण को दूर किया जाता है। इस तरह रोग भी जड़ से दूर हो जाता है। आयुर्वेद की तरह होमियोपैथी में भी इलाज `टिट फॉर टैट´ (जैसे को तैसा) के सिद्धान्त पर होता है, जिसे हमारे यहा¡ `विष: विषस्य औषधम´ का सिद्धान्त भी कहा जाता है। पर जहां आयुर्वेद में खुराक थोड़ी मोटी होती है, वहीं होमियोपैथी में सूक्ष्म खुराकें देकर रोगी को स्वस्थ किया जाता है।&lt;br /&gt;होमियोपैथी में माना जाता है कि पहले किसी भी व्यक्ति में आई गड़बड़ी अपने मनोवैज्ञानिक लक्षण प्रकट करती है। फिर यही लक्षण, जब दवा दिए जाते हैं, तो कई तरह के विकार पैदा होते हैं। या ये मनोवैज्ञानिक लक्षण भी समय के दबाव में बदलते रहते हैं।&lt;br /&gt;ऐसे में बदलते लक्षणों के अनुसार होमियोपैथ दवाओं में परिवर्तन कर उसे दूर करते हैं।&lt;br /&gt;अब अगर आज अपने गांव-घर से दूर कहीं विदेश में आप फंसे हैं, और आपमें घर लौट चलने की इच्छा प्रबल हो रही हो, तो इसे भी होमियोपैथी में एक लक्षण माना जाएगा और इसका इलाज कर आपको संभावित बीमारियों से बचाया जाएगा।&lt;br /&gt;ऐसे लड़के-लड़कियों के लिए जो पढ़ाई के लिए हॉस्टल में डाल दिए गए हों, और वहां उनका मन नहीं लग रहा हो, घर की याद सता रही हो, वे घर भाग जाना चाहते हों, तो उन्हें कैपसिकम-6 की कुछ खुराकें रोज दीजिए। उनका घर वापसी का विचार इससे थमेगा और वे पढ़ाई में मन लगा सकेंगे। ऐसे रोगियों के गाल लाल होते हैं और घर की याद में उन्हें नींद नहीं आती।&lt;br /&gt;पर किसी रोगी में होम सिकनेस हो और घर की याद करते वक्त उस पर एक अनाम उदासी तारी हो जाती हो, ऐसे में आप मर्क सोल-30 को याद कर सकते हैं। ऐसे लोगों में घर को लेकर एक नॉस्टेल्जिया विकसित हो जाता है, जिसे यह दवा दूर कर रोगी को सामान्य होने में मदद करती है।&lt;br /&gt;घर की याद में अगर कोई रोगी अपने आवेगों को संभाल नहीं पाता हो और रोने लगता हो, तो ऐसे लड़के या लड़की को मैग्निशिया म्यूर-200 की एक खुराक तीसरे दिन दिया करें। उसका रोना-धोना घट जाएगा।&lt;br /&gt;पर घर की याद में अगर मन-मस्तिष्क पर दबाव ज्यादा पड़े और परिणामत: उसकी भूख ही मारी जाए, तब आप एसिड फॉस की पहली पोटेंसी का प्रयोग कर सकते हैं या किसी भी रोग में अगर घर लौटने की इच्छा प्रबल हो, तो आप उसे इस दवा से ठीक कर सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-8735167950546135041?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/8735167950546135041/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=8735167950546135041' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8735167950546135041'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/8735167950546135041'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html' title='आ अब लौट चलें - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-2168484756930137167</id><published>2008-04-14T07:21:00.000-07:00</published><updated>2008-04-14T07:28:20.953-07:00</updated><title type='text'>गैस भी हृदय रोग का कारण बन सकता है - कुमार मुकुल</title><content type='html'>पेट में गैस बनने से कई तरह की परेशानिया¡ पैदा होती हैं। सिर दर्द, पेट दर्द से लेकर हृदय दर्द तक के मूल में पेट में गैस का बनना हो सकता है। एक हृदय रोगी छाती में दर्द से परेशान थे। वे डीएमसीएच और एम्स में अपना इलाज करा रहे थे। साल भर पहले उन्हें हृदय रोग ने परेशान किया था। तब वह आरिम्भक अवस्था में था और एम्स (दिल्ली) में इलाज के बाद नार्मल हो गया था। इधर फिर जब दर्द हुआ और जांच हुई तो हृदय स्वस्थ पाया गया और दर्द का कारण शान्त नहीं किया जा सका।&lt;br /&gt;रोगी की जब मुझसे भेंट हुई, तो मैंने लक्षणों के आधार पर उन्हें जैल्सीमियम 30 और कैक्‍टस 30 दिया। उनकी बीमारी थी कि मोटरसाइकिल पर बाहर घूमते-फिरते रहने पर वे स्वस्थ रहते हैं, पर घर में आते ही चक्कर और दर्द बढ़ जाता है। हृदय में जकड़ने के लक्षण भी थे। इन दो दवाओं से स्थिति नियंत्रण में आ गई। पर अब भी दर्द जा नहीं रहा था। फिर मेरा ध्‍यान कार्बोवेज पर गया। इसमें था कि गैस के कारण हर्ट पर दबाव बढ़ जाता है। और परेशानी बढ़ जाती है। तब रोगी को कार्बोवेज 30 दिया गया। इससे स्थिति काबू में आ गई। आगे एम्स में भी चिकित्सक इसी नतीजे पर पहुंचे कि उनका हर्ट स्वस्थ है और दर्द का कारण कहीं पेट में है। तब कारण पता करने के लिए रोगी का बेरियम टेस्ट किया गया। इस टेस्ट में रोग का कारण गैस ही निकला।&lt;br /&gt;गैस से हुई परेशानी में अगर हम शरीर के हिस्सों को ध्‍यान में रखें, तो तीन दवाओं से रोग का निराकरण किया जा सकता है। अगर गैस के चलते पूरे पेट में ऊपर पसली से लेकर नीचे बड़ी आंत तक परेशानी हो, तो रोगी को चायना दी जा सकती है। ऐसे में अगर रोगी पतला हो और उसे कमजोरी से चक्कर आते हों, तो उसे चायना 6 की दस बूंदें सुबह व शाम कुछ सप्ताह दी जानी चाहिए।&lt;br /&gt;पर अगर गैस के चलते परेशानी पेट के निचले हिस्से में हो और दबाव बड़ी आंत पर ज्यादा हो, तो लाइकोपोडियम 30 से उसका उपचार किया जा सकता है। पेट अगर साफ नहीं होता हो और आपको कई बार पाखाना जाना पड़ता हो, तो इसमें भी लाड़ को कम करता है। ऐसे में नक्स वोमिका भी काम करती है और आप लक्षणों के आधार पर उनसे कोई दवा चुन सकते हैं।&lt;br /&gt;गैस का दबाव अगर केवल छाती के ऊपरी क्षेत्रा में हो और पसली के नीचे दबाव ज्यादा हो और हृदय का भी दबाव पड़ रहा हो, तो आप कार्बोवेज का प्रयोग कर सकते हैं। लाइको की तरह कार्बोवेज भी गहरा असर करनेवाली दवा है।&lt;br /&gt;गैस में इन दवाओं के साथ आपको खान-पान पर ज्यादा ध्‍यान देना होगा। एक सलाह जो आम है कि आप सुबह में मुंह धो‍कर एक गिलास सत्तू जरूर पी लें। चाय आप कम पीएं और तला हुआ न खाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-2168484756930137167?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/2168484756930137167/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=2168484756930137167' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2168484756930137167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/2168484756930137167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='गैस भी हृदय रोग का कारण बन सकता है - कुमार मुकुल'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-3336428441558019846</id><published>2007-11-24T20:57:00.000-08:00</published><updated>2007-11-24T21:32:20.062-08:00</updated><title type='text'>ईर्ष्‍यालु और आपे से बाहर रहने वालों की दवा है - नक्‍स वोमिका</title><content type='html'>जहां सोरा या कच्‍छुविष निवारक मुख्‍य दवाओं में सल्‍फर महत्‍वपूर्ण है वहीं बहुरोगमुकित्‍कारक दवाओं में नक्‍स की गिनती होती है। बहुत सारी उल्‍टी-पुल्टि दवाओं के दुष्‍प्रभाव को भी नक्‍स दूर करती है। कब्‍ज की भी यह प्रमुख दवा है। नक्‍स के रोगी को भी उसके मानसिक लक्षणों से पहचाना जा सकता है। यह अत्‍यधिक मानसिक श्रम करने वालों की भी दवा है। मानसिक काम की अधिकता और श्रमहीन जीवन बिताने वाले आधुनिकों को नक्‍स काफी मुफीद आती है। यह कुच्‍ला विष से तैयार दवा है। जिसे रात को सोने के पहले लेने से लाभकर होती है।&lt;br /&gt;        नक्‍स का रोगी स्‍नायविक ,जल्‍दबाज, चि‍ड़चिड़ा और ईर्ष्‍यालु होता है। मानसिक कार्य की अधिकता से परेशान जो लोग चाय,काफी,तम्‍बाकू या अन्‍य नशे का सेवन करते हुए जब रात-रात भर जगकर काम करने की आदत डालते हैं तो उनमें नक्‍स के लक्षण पैदा हो जाते हैं। नक्‍स को मुख्‍यत: पुरूषों की दवा माना जाता है। संभवत: जिस समय दवा पर शोध हुआ होगा उस समय तक स्त्रियां पुरूषों के मुकाबले आज की तरह काम के क्षेत्र में बढ चढकर भागीदार नहीं थीं इसलिए उनमें नक्‍स के लक्षण कम पाए गए होंगे जिससे इसे पुरूष स्‍व्‍भाव की दवा घोषित कर दिया गया होगा।&lt;br /&gt;         नक्‍स रोगी सभी प्रभावों के प्रति असहिष्‍णु होता है। डॉ बोरिक के अनुसार नक्‍स रोगी अभद्र, कपटी और शोरगुल को नपसंद करनेवाला होता है। वह नहीं चाहता कि कोई उसे छुए। उसे लगता है कि समय बीत ही नहीं रहा वह कहीं जाकर ठहर गया है। मामूली रोग की मरीज को असाध्‍य लगता है। दूसरों में मीन मेख निकालने का उनकी निंदा का उसका सव्‍भाव बन जाता है।&lt;br /&gt;        नक्‍स का रागी तुलनात्‍मक रूप से ज्‍यादा भावुक हो जाता है । छोटी बातें भी उसे लग जाती हैं। खाली शरीर रहने से नक्‍स रोगी को पेट दर्द का विचित्र लक्षण भी मिलता है। उसे हमेशा ऐसा लगता है कि उसका पेट साफ नहीं हुआ है और फिर से लैट्रिन जाने की जरूरत है यह लक्षण लाइकोपाडियम में भी है। विलासी जीवन जीने वालों के स्‍वप्‍नदोष को भी यह नियंत्रित करता है। स्‍वप्‍नदोष के साथ कमरदर्द भी हो और रात में करवट बदलने में मरीज को कष्‍ट हो तो नक्‍स अच्‍छा काम करती है।&lt;br /&gt;        नक्‍स रोगी की नींद रात तीन बजे टूट जाती है और फिर नहीं आती इससे वह परेशान रहता है। नक्‍स रोगी के सपने भी व्‍यस्‍त्‍ता और भागदौड़ के होते हैं। पहली नींद के बाद न जगाये जाने से उसे आराम मिलता है। नक्‍स औरी सल्‍फर परस्‍पर पूरक दवाएं हैं। कब्‍ज लगातार रहने पर अगर वह बवासीर में बदल जाए तो इन दोनों दवाओं को बारी बारी लेने से रोगी ठीक हो जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-3336428441558019846?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/3336428441558019846/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=3336428441558019846' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/3336428441558019846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/3336428441558019846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_6354.html' title='ईर्ष्‍यालु और आपे से बाहर रहने वालों की दवा है - नक्‍स वोमिका'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-1427492407411597904</id><published>2007-11-24T04:50:00.000-08:00</published><updated>2007-11-24T05:40:23.697-08:00</updated><title type='text'>चीथड़ों में भी खुद को धनवान समझता है सल्‍फर का रोगी</title><content type='html'>होम्‍योपैथी एक ऐसी चिकित्‍सा पद्धति है जिसमें निदान के लिए मन को केंद्र में रखकर विचार किया जाता है। इसमें माना जाता है कि रोग पहले मन को ग्रसता है फिर वह तन में प्रकट होता है। इसलिए अगर मन के विकार को समझ कर उसका ईलाज किया जाए तो बीमारी बाद में जड़ जमाकर जीर्ण रूप नहीं ले पाती है। होम्‍योपैथी की हर दवा में कुछ मानसिक लक्षण जरूर लिखे होते हैं। उन लक्षणों पर पकड़ रखने वाला चिकित्‍सक आसानी से अपने मरीज की दिक्‍कतों को समझ कर उसका निदान कर पाता है।&lt;br /&gt;         होम्‍योपैथी एक ऐसी चिकित्‍सापद्धति है जिसमें दवाओं को महान कहा जाता है। नहीं जानने वाले के लिए यह हास्‍यास्‍पद हो सकता है, पर चूंकि इस पद्धति में हर दवा के आदमी की तरह विविध लक्षण होते हैं इसलिए एक साथ ज्‍यादा लक्षणों को वहन करने वाली दवाओं को महान पुकारा जाता है। नक्‍स वामिका, थूजा, मर्कसाल,सल्‍फर आदि दर्जनों ऐसी दवाएं हैं जिन्‍हे हनिमैन और बाद के चिकित्‍सकों ने महान दवा कह कर पुकारा है। इस तरह मन और मनुष्‍य से ज्‍यादा जुड़ाव के चलते इन दवाओं का मनुष्‍य की तरह एक मानवीय चेहरा बनता है।&lt;br /&gt;                जैसे चर्चित दवा सल्‍फर को लें। इसके कई लक्षण बौद्धिक वर्ग की कई मानसिक गड़बडि़यों की ओर ईशारा करते हैं। दिन-रात बौद्धिक व्‍यायाम में रमें लोगों को यह दवा उनकी कई परेशानियों से निजात दिला सकती है। जैसे कि भुलक्‍कड़ों की यह खास दवा है, ज्‍यादा माथापच्‍ची से स्‍वभावत: पैदा भुलक्‍कड़पन को यह दवा दूर कर सकती है। लगातार पेशेवर सोच-विचार से जब सोच की प्रक्रिया कुंद होने लगे तो सल्‍फर की खुराक आपको राहत दे सकती है।&lt;br /&gt;                 सल्‍फर के मरीजों की बहुत सी आदतें पारंपरिक भारतीय समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों में दिखाई पड़ती हैं। जैसे कि सल्‍फर का रोगी चीथड़ों में रहकर भी खुद को धनवान समझता है। वह अनावश्‍यक व्‍यस्‍त रहता है और बच्‍चों की तरह असंतोष व्‍यक्‍त करता है। श्राप देने वाले अपने ऋषियों को हम यहां याद कर सकते हैं, खासकर दुर्वासा जी को जिनके डर से लक्ष्‍मण ने अपने भाई राम की आज्ञा को भुलाकर उन्‍हें भीतर जाने दिया था और इसके दण्‍ड स्‍वरूप उन्‍हें रामजी ने देशनिकाला ही दे दिया था और शर्मसार लक्ष्‍मण को सरयू में डूबकर आत्‍महत्‍या करनी पड़ी थी। फिर लक्ष्‍मण के शोक में रामजी ने खुद भी सरयू की जलसमाधि ले ली थी।&lt;br /&gt;             सल्‍फर का रोगी स्‍वर्थी भी ज्‍यादा हो जाता है और अपने अच्‍छे संबंधों को भी बिगाड़ लेता है। वह चिड़चिड़ा हो जाता है और दूसरों को इज्‍जत नहीं  देता । उसमें धार्मिक उन्‍माद भी पाया जाता है। अलबत्‍ता ऐसे आदमी का अपने कारोबार में मन नहीं लगता। वह निरर्थक समय गंवाता है। आलस्‍य भी उसका एक मुख्‍य लक्षण होता है।&lt;br /&gt;        सल्‍फर रोगी की नींद बिल्‍ली सी होती है और दिन के ग्‍यारह बजे उसे पेट धंसने सी अनुभूति होती है और उसे लगता है कि उसके पेट में कोई जीवित प्राणी है। ग्‍यारह बजे दिन को अगर कमजोरी और चक्‍कर आए तो भी इस दवा से लाभ होता है। अगर किसी रोगी को सुनाई कुछ ज्‍यादा देने लगे तो उसे सचेत हो जाना चाहिए कि आगे वह अपनी सुनने की शक्ति खो दे सकता है ऐसे रोगी सल्‍फर की खुराकें लेकर अपना बचाव कर सकते हैं।&lt;br /&gt;               सल्‍फर का रोगी नींद में बातें भी करता है। हल्‍की आहट से उसकी नींद टूट जाती है। रात दो से सुबह पांच के बीच अगर अनिद्र तंग करे तब भी सल्‍फर को याद करना चाहिए। इसमें एक मजेदार लक्षण है कि इसका रोगी स्‍पष्‍ट सपने देखता है और गीत गाते हुए जागता है। अगर ये लक्षण किसी व्‍यक्ति में हों तो उसे अपने चिकित्‍सक से सल्‍फर के प्रयोग को लेकर सलाह लेना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-1427492407411597904?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/1427492407411597904/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=1427492407411597904' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/1427492407411597904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/1427492407411597904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_24.html' title='चीथड़ों में भी खुद को धनवान समझता है सल्‍फर का रोगी'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-6762530380232460866</id><published>2007-11-13T20:19:00.000-08:00</published><updated>2007-11-13T20:41:44.001-08:00</updated><title type='text'>स्‍वाद मर जाने पर हम मिक्‍सचर पसंद करते हैं</title><content type='html'>एक पुरानी कहावत है कि चालीस पार का व्‍यक्ति अपना डाक्‍टर आप होता है...। मतलब प्रौढ़ वय का होने तक हर व्‍यक्ति सहज ढ़ंग से स्‍वास्‍थ्‍य के रहस्‍यों से परिचित हो जाता है। अगर आप चीजों के मूल रूप, रंग, गंध, स्‍वाद आदि को पहचानते हैं तो आप जीवित हैं, स्‍वस्‍थ हैं। अगर आप खिचड़ी अचार पसंद करते हैं तो समझिए कि आप गड़बड़ा रहे हैं। मुंह का स्‍वाद मर जाने पर ही आदमी मिक्‍सचर यानि सेव, दालमोट जैसी चीजें पसंद करता है।&lt;br /&gt;               वरिष्‍ठ कवि &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;केदारनाथ सिंह &lt;/span&gt; लिखते हैं- &lt;span style="font-style: italic;"&gt;कभी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; कभी हमें गेहूं से मिलने मंडियों में नहीं , खेतों में जाना चाहिए &lt;/span&gt;तो वे उसी स्‍वद को जानने की बात कर रहे होते हैं। स्‍वाद को जानें और उसे बदलते रहें। प‍रिवर्तन स्‍वास्‍थ्‍य का पहला नियम है। अपनी जीवन शैली में आप बदलाव की गुंजाइश हमेशा रखें। परिस्थितियों के अनुसार खुद को नहीं बदल पाने के कारण ही डायनासोर मिट गये। तिलचट्टे बच गए और आदमी भी बच रहा है क्‍यों कि वह भी तिलचट्टे की तरह सर्वहारा है।&lt;br /&gt;          योगासनों में शीर्षासन श्रेष्‍ठ माना जाता है क्‍योंकि इसमें आदमी कुछ देर के लिए पैर की बजाय सिर के बल खड़ा हो जाता है। कुछ क्षण के लिए पूर प्रक्रिया को उलट देता है। हीगेल के विचारों को उलट कर ही मार्क्‍स ने क्रांति कर दी। उपवास भी ऐसा ही बदलाव लाते हैं दैनिक में । वह एक विराम है आपके जीवन में जहां से आप एक नयी पारी की शुरूआत कर सकते हैं। उपवास का मतलब है जीवन की नियमित गति को बाधित करना। एक व्‍‍यतिक्रम पैदा करना जिसे जीवन की रूक रही धारा में तेजी आए। उपवास से एक स्‍व्‍स्थ व्‍यक्ति का खून बढ़ जाता है ऐसा जांच में पाया गया है।&lt;br /&gt;          हां शहरी गैस के रोगी हो चुके व्‍यक्ति को उपवास की सलाह नहीं दी जा सकती । उपवास वह भी नहीं है जो आम भारतीय स्त्रियां करती हैं और पारण के तत्‍काल बाद मन भर तला भुना खा लेती हैं। नतीज खून की जगह चर्बी बढ़ जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-6762530380232460866?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/6762530380232460866/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=6762530380232460866' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6762530380232460866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6762530380232460866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_13.html' title='स्‍वाद मर जाने पर हम मिक्‍सचर पसंद करते हैं'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-6980983794238213187</id><published>2007-11-11T08:14:00.000-08:00</published><updated>2007-11-11T08:40:08.625-08:00</updated><title type='text'>रोगों की पूर्व सूचक - खुजली</title><content type='html'>खुजली इस बात की सूचक है कि रोग विषों ने आपके शरीर में डेरा बनाना आरंभ कर दिया है। होम्‍योपैथी में इस रोग विष को सोरा पुकारा जाता है। और सोरा को सभी रोगों का जनक माना जाता है।&lt;br /&gt;        शरीर में पहले पहल जब रोग विष जड़ जमाने लगते हैं तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे निकाल बाहर करने का काम आरंभ कर देती है। यही निष्‍कासन जब त्‍वचा पर प्रकट होता है तो उसे खुजली पुकारा जाता है। अब खुजली के रूप में हो रहे आरंभिक निष्‍कासनों को आप किस प्रकार लेते हैं इसी पर आपका स्‍वास्‍थ्‍य निर्भर करता है।&lt;br /&gt;         अगर गलती से आप अपनी त्‍वचा पर हो रहे सोरा विषों के स्‍फोट का गलत दवाओं ओर मरहमों से दबा देते हैं तो वही भविष्‍य में चिररोगों का कारक बनते हैं। इसलिए यह आम धारणा सही है कि खुजली होते ही लोग होम्‍योपैथी को याद करते हैं। क्‍यों कि वहां सोरा के इस विष को दबाने की जगह उसे उचित दवा से निष्‍कासित करने की कोशिश की जाती है। आगे विष के इन निष्‍कासनों के कारकों को पहचान कर उसे दूर करने की कोशिश होती है। यूं भी होम्‍योपैथी में रोगी की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने की कोशिश की जाती है जिससे रोग विषों से शरीर खुद निजात पा सके।&lt;br /&gt;           सोरा जैसे सारे रोगविषों को दूर करने वाली मुख्‍य होम्‍यो दवा सल्‍फर है। इसकी क्रिया शरीर के भीतर से बाहर त्‍वचा पर होती है। बैंगन में सल्‍फर अधिक होता है इसलिए लोग खुजली में इससे परहेज करते हैं। होम्‍यो सिद्धांत में विष ही विष की दवा है इसलिए सल्‍फर की सूक्ष्‍म मात्र से सोरा का इलाज हो जाता है।&lt;br /&gt;             दरअसल शरीर की सल्‍फर शोषण की क्षमता जब खत्‍म हो जाती है तो शरीर को प्राप्‍त सल्‍फर को वह पचा नहीं पाता और वह शरीर पर सोरा विष के रूप में खुजली के रूप में प्रकट होता है। बैगन में सल्‍फर अधिक होने से उसे खाने पर शरीर ज्‍यादा सल्‍फर ले नहीं पाता इसलिए वह खुजली बढ़ाने में कारक बन जाता है।&lt;br /&gt;        सल्‍फर के प्रयोग से आरंभ में कभी - कभी त्‍वचा रोग बढ भी जाते हैं पर अगर चिकित्‍सक सही अनुपात में दवा के पावर का प्रयोग करे तो हमेशा ऐसा नहीं होता। इससे बचने के लिए अन्‍य सहयोगी दवाओं के प्रयोग से राहत मिलती है। ओर अंत में रोग जड़ से दूर हो पाता है।&lt;br /&gt;                    सल्‍फर को रोगी को आप उसके लक्षणों से पहचान सकते हैं। सल्‍फर को रोगी गंदा रहता है और नहाने से बचता है। देर तक सीधा खड़ा रहने में उसे कष्‍ट होता है। सर्दी में सल्‍फर रोगी की नाक घर के भीतर बंद रहती है। ऐसे लक्षणों में खुजली ना होने पर भी सल्‍फर उसे आराम करता है। सल्‍फर के अलावे रूमेक्‍स, विन्‍क माइनर, ओलिएंडर, सोरिनम, रसटाक्‍स, सेलिनियम, डौलीकौस प्‍यूरिएंस, पल्‍साटिल्‍ला, बोविस्‍टा आदि से भी अपेक्षित परिणाम पाए जा सकते हैं बशर्ते उन्‍हें उनके मिलते लक्षणों के आधार पर दिया जाए। इसके साथ चिकित्‍सक की राय से खटाई, बैंगन और रूखे साबुन से बचा जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-6980983794238213187?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/6980983794238213187/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=6980983794238213187' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6980983794238213187'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6980983794238213187'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_11.html' title='रोगों की पूर्व सूचक - खुजली'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-3163332583488349108</id><published>2007-11-10T09:19:00.000-08:00</published><updated>2007-11-10T09:46:33.352-08:00</updated><title type='text'>इन आंखों से बावस्‍ता...</title><content type='html'>इन आंखों से बावस्‍ता अफसाने हजारों हैं ... यह गाना आपने सुना होगा पर इन आखों से जुड़े अफसानों को आप तब पढ़ पाएंगे जब वे स्‍वस्‍थ हों। खाने में नमक का प्रयोग उसे स्‍वादिष्‍ट बनाता है पर इसका ज्‍यादा प्रयोग कई बीमारियों का कारक बनाता है। आंख की अधिकांश बीमारियों में नमक कम करने लाभ होते देखा गया है।&lt;br /&gt;            आंख से पानी आना, लाली, खुजली आदि कई रोगों को नमक छोड़कर ठीक किया जा सकता है। आंख की बीमारियों में आप सप्‍ताह भर संभव हो तो नमक छोड़ कर देखें तो इसका लाभ साफ नजर आएगा। नमक की तरह ज्‍यादा चीनी भी आंखों को नुकसान पहुंचाती है। नमक को नेट्रम म्‍यूर कहा जाता है इस रूप में यह एक प्रभावशाली बायोकेमिक दवा है। होम्‍योपैथिक तरीके से नेट्रम म्‍यूर की सूक्ष्‍म मात्रा देने से आंखों की बीमारियों में बहुत फायदा होता है। ज्‍यादा नमक छुड़ाने के लिए भी नेट्रम म्‍यूर को लाख पोटेंशी में देने की सलाह चिकित्‍सकर देते हैं।&lt;br /&gt;           आंख की सामान्‍य बीमारियों में गुलाब जल कई सामान्‍य एलोपैथिक आई ड्राप्‍स से ज्‍यादा कारगर होता पाया गया है। यूं होम्‍योपैथी की प्रसिद्ध दवा कैलेंडुला जिसे गेंदा के फूल के अर्क के रूप में भी जाना जाता है , से बनी दवा भी आंख की सामन्‍य बीमारियों में आराम पहुंचाती है। कैलेंडुला क्‍यू की पांच बूंद आधे औंस साफ पानी में मिला कर घर पर भी इसका प्रयोग आंखों को आराम पहुंचाने में किया जा सकता है। इसे आप गुलाब जल की तरह प्रयोग कर सकते हैं।&lt;br /&gt;         आंख की कई बीमारियों में जब एलोपैथिक दवा के लगातार प्रयोग से इरिटेशन होने लगे तो बीच में कैलेंडुला मिले जल से आंखें घोने से लाभ होता है। यह उन दवाओं के साइड इफेक्‍ट को भी कम करती है। कैलेंडुला से बनी क्रीम जले-कटे के घावों को जिस तरह ठीक करती है वह भी आश्‍चर्यजनक है।&lt;br /&gt;         भोजन में नमक चीनी की अधिकता से मोतियाबिंद होता है। ज्‍यादा नमक से आंखों का लेंस सूख जाता है और ज्‍यादा चूना युक्‍त कठोर जल के प्रयोग से भी मोतियाबिंद होता है। आंख आने की सामान्‍य बीमारी जब तब फैलती रहती है ऐसे में होम्‍यो दवा पल्‍साटिल्‍ला 200 की कुछ गोलियों का प्रयोग चमत्‍कारी असर करती है। इससे अगर घर में किसी को आंख्‍ा आ गयी हो तो वह दूसरे को नहीं फैलती है और अगर हो जाए तो बढती नहीं है। इसे सुरक्षात्‍मक रूप से भी वैसी स्थिति में लिया जा सकता है। साफ पानी में आंखों को डुबोने से भी जलन आदि में आराम पहुंचता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-3163332583488349108?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/3163332583488349108/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=3163332583488349108' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/3163332583488349108'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/3163332583488349108'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_10.html' title='इन आंखों से बावस्‍ता...'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-4410997468748197404</id><published>2007-11-05T19:11:00.000-08:00</published><updated>2007-11-05T19:29:13.507-08:00</updated><title type='text'>दांत दर्द - अन्‍य दवाएं</title><content type='html'>दांद दर्द में या तो दांतों की जड़ अंदर से सड़ जाती है या  वह गलने लगती है और अक्‍लदाढ़ में खोडरे या गड्ढे बनने लगते हैं। इनमें जब फंस कर अन्‍न के टुकड़े सड़ने लगते हैं तो कई तरह की परेशानियां पैदा होती हैं। एलोपैथ अक्‍सर खोडरे को सोना चांदी या पत्‍थर के पेस्‍ट से  भर देते हैं। कई बार दांत भरवाने के बाद भी दर्द बना रहता है ऐसे रोगी अगर होम्‍यो दवा आर्निका 30 लें तो उन्‍हें काफी आराम मिलता है।&lt;br /&gt;         मर्कसाल दांद दर्द की प्रमुख दवा है इसे मुंह की अधिकांश बीमारियों को दूर करने वाली दवा के रूप में भी जाना जाता है। अगर दांत का बाहर का हिस्‍सा सड़ जाए, मुंह में लार ज्‍यादा बनने लगे, प्‍यास बढ़ जाए और दांत ज्‍यादा लंबे महसूस हों व अक्‍सर दांत का दर्द रात में उभरे तो आप मर्कसाल की कुछ गोलियां दो तीन बार दिन में लेकर आराम पा सकते हैं।&lt;br /&gt;       पर अगर बीमारी दांत के उपरी हिस्‍से में ना होकर उसकी जड़ में हो और चाय या ठंडा पानी दांत में लगे तो दर्द हो या मसूड़ों में सूजन हो  तो थूजा 30 से उसका शमन किया जा सकता है।&lt;br /&gt;       अक्‍सर लोग दांत दर्द पुराना पड़ने पर चिकित्‍सक के पास जाते हैं। पर अगर इन दो दवाओं का प्रयोग आरंभ में किया जाए तो लंबे समय तक दांत उखड़वाने से बचा जा सकता है। मिले जुले लक्षण होने पर आप इन दोनों दवाओं का प्रयोग बारी बारी से सप्‍ताह भर के अंतर पर कर लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं।&lt;br /&gt;       अगर दांत काले होकर खुरदरे होते जाएं और झड़ने लगें उनमें दर्द होने लगे तो ऐसे  क्रियोजाट 30 या 200 को अच्‍छा काम करते देखा गया है। दांत दर्द में अगर गर्म पानी से आराम हो तो कमामिला और ठंडे पानी से आराम हो तो काफिया से आराम मिलता है। दांत उपर से ठीक दिखें और खाना खाने बाद दर्द हो तो ऐसे में स्‍पाइजेलिया का प्रयोग किया जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-4410997468748197404?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/4410997468748197404/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=4410997468748197404' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/4410997468748197404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/4410997468748197404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post_05.html' title='दांत दर्द - अन्‍य दवाएं'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8360489114414863441.post-6682035077338711771</id><published>2007-11-04T09:00:00.000-08:00</published><updated>2007-11-05T19:11:21.709-08:00</updated><title type='text'>अक्‍लदाढ़ का दर्द</title><content type='html'>चर्चित कवि मंगलेश डबराल को जब आयोवा यात्रा के दौरान भयानक दांत दर्द ने परेशान किया, तो जांच के बाद डाक्‍टरों ने पूछा कि आपकी अक्‍लदाढ़ उखाड़नी होगी, तो मंगलेश ने इस पर चुटकी लेते कहा - अगर अक्‍लदाढ़ उखड़वाना ही इलाज है तो मैं उसे स्‍वदेश में ही उखड़वाउंगा। और भारत आने तक उन्‍होंने दर्द निवारक दवा से काम चलाया।&lt;br /&gt;मतलब अमेरिका जैसे सुविकसित देश में भी दांत दर्द का इलाज उसे अंतत: उखड़वाना ही होता है। पर अगर लक्षणों का मिलान कर होम्‍योपैथी की सही दवा का प्रयोग किया जाए, तो आप दांत निकलवाने से लंबे समय तक बच सकते हैं।&lt;br /&gt;अक्‍सरहां दांत दर्द होने पर मर्क साल 30 और थूजा 30 का प्रयोग उसकी अधिकांश समस्‍याओं का निदान कर देता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8360489114414863441-6682035077338711771?l=hindihomoeo.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/feeds/6682035077338711771/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8360489114414863441&amp;postID=6682035077338711771' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6682035077338711771'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8360489114414863441/posts/default/6682035077338711771'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindihomoeo.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='अक्‍लदाढ़ का दर्द'/><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
